हिमालय की नंदा देवी राजजात यात्रा एशिया की सबसे बड़ी लंबी पैदल यात्राओ में से एक है। हिंदू मान्यता अनुसार हर 12 साल में एक राजजात यात्रा का आयोजन किया जाता है। यह यात्रा नॉटी से शुरू होती है और हिमालय में हेमकुंड तक जाती है।
इसे लेकर पहाड़ी सुविधा आपको मां नंदा देवी की राजजात यात्रा की पूरी कहानी बताने की कोशिश करेगे और आपको इन प्रश्नों का भी जवाब देंगे कि कैसे और क्यों नंदा देवी राज यात्रा की शुरुआत की गई है। और साथ ही बताएंगे की मां नंदा देवी के दरबार में पहले इंसानों की बलि दी जाती थी जिसे बाद में बदलकर क्यों और कैसे जानवरों की बलि दी जाती है।

मां नंदा देवी कैसे कुमाऊ आई ?
16वीं शताब्दी में कुमाऊं और गढ़वाल के बीच युद्ध हुआ, जिसमें कुमाऊं के राजा बाज बहादुर चंद ने पिंडर घाटी और लेबा पर विजय प्राप्त की। इसी युद्ध में उन्होंने मां नंदा देवी की मूर्ति प्राप्त की। जब वह मूर्ति को अल्मोड़ा ले जा रहे थे, उन्होंने अपने सैनिकों को उसे ज़मीन पर रखने का आदेश दिया। लेकिन जब पुनः उठाने को कहा, तो कोई भी उसे हिला नहीं सका। तब राजा ने मां नंदा से क्षमा मांगी और वचन दिया कि वह उनकी सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ेंगे। इसके बाद मूर्ति स्वयं उठाई जा सकी और राजा ने उसे अपने मल्ला महल में स्थापित कर दिया। यहीं से कुमाऊं में मां नंदा का आगमन हुआ।
मां नंदा का संबंध केवल पहले सिर्फ गढ़वाल से जोड़ा जाता था। लेकिन अब यह दोनों क्षेत्रों की परंपरा है। साथ में आराध्या भी है। विलियम सेक्स अपनी किताब विलियम सेक्स भी अपनी किताब माउंटेन गॉड्सजेंडरऔर पॉलिटिक्स इन हिमालयन पिलग्रीम में बताते हैं कि 17वीं शताब्दी में कुमाऊं के राजा को यह पता चलता है कि गढ़वालियों की बार-बार जीत की वजह नंदा देवी हैं। तो वह मां नंदा की मूर्ति गढ़वालियों से चोरी कर कुमाऊं में लेकर आया राजा को लगा कि नंदा देवी की पूजा अर्चना करने से उसको भी जीत मिलेगी। अब कुमाऊनी सेना का नारा भी नंदा देवी की जय भी बन गया था और राजा को युद्ध में जीत भी मिल गई। राजा को लगा कि यह सब नंदा देवी की जय बोलने से ही हो रहा है। इस तरह नंदा देवी राजा की इष्ट भी बन गई। और हमेशा के लिए वे कुमाऊ के स्थापित हो गई।
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मां नंदा देवी का इतिहास
1925 के बाद 75 साल बाद 2000 में ही में नंदा राजजात यात्रा में शामिल हुई थी। हालांकि ऐसा भी कहा जाता है कि नंदा जो कुमाऊं मंडल में बहुत पहले से थी जिसका साक्षी इतिहास में मिलता है लेकिनआधिकारिक तौर परऔर जो ताम्र पत्र मिलते हैं। उनके मुताबिक कुमाऊं में नंदा राजजात के शुरू होने के सबूत 16वीं शताब्दी से मिलते नजर आते हैं।
वैसे तो पुराणो में भगवान शिव की अर्धांगिनी और हिमालय की बेटी नंदा को लेकर कई सारी कहानिया है। उत्तराखंड में जागरों द्वारा नंदा देवी का जिक्र खूब देखने को मिलता है, जिसमें मां नंदा देवी को लेकर कई गाने के जरिए लोगों तक कहानी बताई गई है। अगर आप इतिहास में जाकर नंदा देवी को ढूंढने की कोशिश करते हैं तो कई ऐसे किस्से हैं जो अभी भी उन किताबों में नहीं मिलते हैं।
यह भी कहा जाता है कि नंदा राजजात यात्रा 16वीं शताब्दी के आयजपाल या कल्याण पाल को इसका श्रेय दिया जाता है। खैर इतिहास तो कई सारे मिलते हैं, लेकिन यह सच है कि यह उत्तराखंड की ईष्ट देवी है
कौन है नंदा देवी?
नंदा देवी हिमालय की राजा हेमंत और रानी मीनावती की बेटी है इनको दो नाम गौरा और पार्वती से भी जाना जाता है। कहीं जगह पर इनको उमा भी कहा जाता है। यह भगवान शिव की अर्धांगिनी है। नंदा को खस की देवी भी कहा जाता है। नंदा पर्वत चमोली मे स्थित है। यह पर्वत भी नंदा देवी से जुड़ा हुआ है।
मध्यकालीन में एक लोक कथा बड़ी ही प्रचलित है। इसके मुताबिकअल्मोड़ा के चंद्रवंशी राजाओ की यह राजकुमारी थी। जिनकी अचानक मृत्यु होने से उनके नाम पर मंदिर का निर्माण करवाया गया।गढ़वाली जागरों में मां नंदा का जिक्र गायनों के जरिए किया जाता है, जिसमें गढ़वाल के चांदगढ़ राजा की दूसरी बेटी थी। जिनका विवाह भगवान शिव के साथ किया गया। वहीं उनकी पहली पुत्री का विवाह धरागढ़ के राजा कनक पाल के साथ किया गया था।

आखिर नंदा देवी आई कहां से
इन पर्वतों पर त्रिशूल पीक एक श्रृंखला है जहां से मंदाकिनी नदी निकलती है। इस उद्गम स्थल को नंदक स्थल भी कहा जाता है। साफ बात है कि हिमालय पर्वत का नाता हर जगह से मां नंदा से जुड़ी हुई है। नंदा राजजात को 12 साल की अवधि इसलिए रखी गई थी कि नंदा भगवान शिव से विवाह करने के बाद 12 साल अपने मायके लौटी थी। और करीब 8 दिन मायके का वैभव लेकर वापस ससुराल लौटी। मां नंदा को ससुराल भेजने की परंपरा को ही नंदा राजजात यात्रा के रूप मे मनाया जाता है।
एशिया कि सबसे बड़ी पैदल यात्रा
हिमालय की नंदा देवी राजजात यात्रा एशिया की सबसे बड़ी लंबी पैदल यात्राओ में से एक है। हिंदू मान्यता अनुसार हर 12 साल में एक राजजात यात्रा का आयोजन किया जाता है। यह यात्रा नॉटी से शुरू होती है और हिमालय में हेमकुंड तक जाती है।
इस दौरान श्रद्धालु 280 किलोमीटर तक पैदल यात्रा करते हैं। यह यात्रा 19 से 20 दिनों में पूरी की जाती है। यात्रा के दौरान श्रद्धालु 17 जगह पर रात्रि विश्राम करते हैं।
नॉटी से जो कागजी दस्तावेज के अनुसार 1886, 1905,1925, 1951, 1987 और 2000 में राजजात यात्रा का आयोजन किया गया है। वर्तमान की बात करें तो 2013 में इसका आयोजन किया था और अब 2026 में इसके आयोजन की तैयारी की जा रही है।
ऐसा माना जाता है कि यशोधावल की पत्नी ने यहां अपने बच्चे को जन्म दिया था जिससे यह स्थान अपवित्र हो गया था। साथ में यह भी माना जाता था कि इससे मां नंदा देवी रुष्ट हो गई थी। जिससे एक बर्फीले तूफान की चपेट में आकर यशोधवल और उनके साथ जो लोग गए थे वे सभी मारे गए।
आज भी जो रूपकुंड में यहां हड्डियां देखी जाती हैं ऐसा कहा जाता है कि यह हड्डियां उन्हीं लोगों की थी। माना जाता है इसी हादसे की वजह सेऔरतों और बच्चों को बेदनी बुगयाल से आगे नहीं जाने दिया जाता है।
नंदा देवी को कतूरी राजाओं ने अपनी कुलदेवी के रूप में माना है भले ही इस यात्रा को हर 12 साल में किए जाने की परंपरा है लेकिन इतिहास में ऐसा ना के बराबर ही हो पाया है।

राज जात यात्रा कि शुरुवात
हालांकि राजजात करने के लिए दो अहम संकेत जरूरी होते हैं। मान्यता है की मां नंदा देवी अपने मैतयू के गांव कासुआ पर दोष लगती है। दोष लगने का मतलब है कि इस क्षेत्र मे कुछ अप्रिय घटनाएं होने लगती है। इससे कासुआ के कुंवर समझ जाते हैं कि राजजात यात्रा की तैयारी करते है।
मान्यता यह भी है की मां नंदा देवी इन लोगों के सपनो में आकर राजजात यात्रा की तैयारी भी करवाती हैं। मां के दोष लगने पर चौ सिंघीया खाड़ू खोजा जाता है।जिसका जन्म इसी चाँद पुर पट्टी मे होता है। नंदा देवी का यह चौ सिंघीया खाड़ू नंदा राज जात यात्रा की अगवानी करता है।
ऐतिहासिक मे पलट कर देखे तो नंदा देवी राजजात यात्रा की शुरुआत सातवीं से आठवीं शताब्दी के दौरान हुई होगी और यह भी माना जा सकता है कि इससे पहले भी छोटी-छोटी यात्राएं होती रही होगी।
मां नंदा देवी के श्राप से अग्रेज हुआ था अंधा
राजा बाज बहादुर चंद ने नंदा देवी को जब अपने महल में मूर्ति को स्थापित किया था। ब्रिटिश शासन के दौरान ब्रिटिश राज्य में ट्रेल यहां का पहला कमिश्नर बना। उस दौरान उसने मूर्ति को इस महल से हटा दिया था। उसके तुरंत बाद वह अंधा हो गया था। बाद में गांव के लोगों ने बताया कि उसने ऐसा करने माँ का श्राप मिला है। माना यह भी जाता है कि बाद में उसे कमिश्नर ने उस मूर्ति को वापस उसी जगह पर स्थापित कर दि थी। स्थापित करने के तुरंत बाद उसकी आंखों की रोशनी भी वापस आ गई थी।
हालांकि कुछ लोग इस बात को इनकार करते हैं कि वह मूर्ति हटाने से अंधा हूआ था बल्कि उसकी आँखों पर तेज रोशनी पड़ने उसका अंधापन गया। इसलिए वह कुछ समय के लिए अंधा हो गया था।
नंदा देवी और मानव बली
उत्तराखंड में अंग्रेजों के आने से पहले यहां नंदा देवी में मानव बलि चढ़ाने की परंपरा थी। शिव सिंह डबराल अपनी किताब उत्तराखंड यात्रा दर्शन में इसका जिक्र करते हैं। वह इस किताब में लिखते हैं कि हर 12 साल में मानव बलि देने की दिए जाने का एक प्रावधान था। हर 12 साल में सयानी गांव के लोग इस प्रथा से जुड़ते और गांव के सबसे उम्रदराज व्यक्ति को इसके लिए चुना जाता था। इस दौरान उस शख्स के नाखून और बाल काट दिए जाते थे। बाद मे उसे नहलाकर एक कमरे में बंद कर दिया जाता था। उसका जीवन उस बंद कमरे मे ही होना होता था। और फिर उसे किसी से मिलने नहीं दिया जाता। उस ब्यक्ति का खाना – पीना उसी बंद कमरे मे होता था।उसे पूरे दिन में एक ही बार खाना पड़ता था। इस तरह से वह एक या दो साल में अपने प्राण त्याग मां नंदा को समर्पित हो जाती थी।
आज गढ़वाल और कुमाऊं को एक साथ मिलने का काम मां नंदा देवी ही करती है। यह एक ऐसी देवी थी जिनकी शरण में कभी बकरों की बली नहीं बल्कि इंसान अपनी स्वेच्छा से बली दिया करते थे।हालांकि अंग्रेजों के आने के बाद इस प्रथा को अंग्रेजों ने बंद करवा दी थी। तब से यह प्रथा आज तक बंद है।
राजजात यात्रा में बकरा और भैसे की बलि देने की भी प्रथा थी। जो अब ना के बराबर की जाती है। विलियम सेक्स भी अपनी किताब माउंटेन गॉड्सजेंडरऔर पॉलिटिक्स इन हिमालयन पिलग्रीम मे बताते हैं कि दसवीं शताब्दी के बीच लोगों के महानंदा के लिए मानव बलि देने के कई सबूत मिलते हैं।
इस राज जात यात्रा से लोकल व राज्य सरकार की Economy को फायदा मिला है :
2000 की राजजात यात्रा की बात करें तो उस दौरान ₹160 करोड़ से ज्यादा का राजस्व लोकल मार्केट में ही आया। अब राजजात यात्रा की तैयारी 2026 में शुरू होने जा रहा है। उस यात्रा में भी मां नंदा का वैभव जरूर देखने जरूर मिलेगा।
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निसकर्ष :
मां नंदा को लेकर मान्यताएं और कहां कहानी भले ही अपने आप में विचित्र है। लेकिन इतिहास भी इस बात का सबूत देता है की मां नंदा देवी का अस्तित्व पहाड़ में युगो – युगो से रहा है। वही मां नंदा के नाम पर यात्राएं भी हुआ करती थी। बाद में यहां किसी एक राजा ने इन छोटी-छोटी यात्राओं को एक बड़ी यात्रा में तब्दील कर दिया था। जो अब नंदा देवी राजजात यात्रा बन गई है।
दोस्तों आस्था से जुड़ी हमारे उत्तराखंड मे कई ऐसी ही कहानिया है, जिनसे उत्तराखंड ही नहीं बल्कि दुनिया ही अभी वाकिफ नहीं है। इसलिए पहाड़ी सुविधा हर ऐसी ही विचित्र कहानियों को लेकर आप तक पहुचता है। उम्मीद करते है आने वाले नंदा देवी राज जात यात्रा मे आप जरूर शामिल होंगे। साथ ही इस कहानी को अपने दोस्तों परिजनों के साथ शेयर जरूर करे।
क्या अभी भी नंदा राजजात यात्रा मे बलि प्रथा है ?
ना मात्र के बराबर! अंग्रेजों के आने के बाद इस प्रथा को अंग्रेजों ने बंद करवा दी थी। तब से यह प्रथा आज तक बंद है।
नंदा राजजात यात्रा कितने सालों मे किया जाता है?
हिन्दू मान्यता अनुसार यह प्रथा 12 सालों मे एक बार किया जाता है। जिसमे चौ सिंघीया खाड़ू नंदा राज जात यात्रा की अगवानी करता है।
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