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संविदा कर्मचारियों की पीड़ा: समान काम, फिर भी असमान सम्मान — कब सुनेगी सरकार?

संविदा कर्मचारियों की पीड़ा

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Pahadi Shuvidha की आवाज : “दीवाली पर जब सबके घर खुशियाँ आईं, तब भी हजारों संविदा कर्मचारी उम्मीद की लौ जलाए बैठे हैं।”

संविदा कर्मचारियों की पीड़ा आज उत्तराखंड में एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है।
जहाँ एक ओर UPCL जैसे सरकारी विभागों के नियमित कर्मचारियों को दीवाली पर ₹10,000 तक का बोनस दिया जा रहा है,
वहीं संविदा कर्मचारियों को मात्र ₹5,000 या उससे भी कम राशि मिल रही है।

सवाल यह उठता है कि —
  जब राजस्व (Revenue) उत्पन्न करने का काम ये ही कर्मचारी करते हैं,
 जब सारा फील्ड वर्क इन्हीं के कंधों पर टिका है,
तो फिर बोनस और सम्मान में इतना बड़ा अंतर क्यों है?
यही संविदा कर्मचारियों की पीड़ा का सबसे बड़ा कारण है।

संविदा कर्मचारियों की पीड़ा 7 महीने बाद भी अधर में लटका नियमितीकरण का वादा

मुख्यमंत्री द्वारा उत्तराखंड संविदा कर्मचारी नियमितीकरण को लेकर की गई घोषणा को 7 महीने से अधिक बीत चुके हैं,
फिर भी कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई है।
यह स्थिति न केवल संविदा कर्मचारियों की पीड़ा को और बढ़ा रही है, बल्कि सरकार की संवेदनहीनता भी दर्शाती है।

2018 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय और 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने इन कर्मचारियों के पक्ष में स्पष्ट आदेश दिए,
लेकिन अब तक सचिवालय में बैठे अधिकारी उन आदेशों को लागू करने से बच रहे हैं।
कर्मचारी अब सवाल पूछ रहे हैं —

इसे भी पढे: नियमितीकरण नियमावली में संशोधन की मांग

“क्या सरकार न्यायालय से ऊपर हो गई है?”

संविदा कर्मचारियों की पीड़ा

“नियमितीकरण नहीं तो आंदोलन” – 10 नवम्बर से सड़कों पर उतर सकते है कर्मचारी

अब संविदा कर्मचारियों की पीड़ा आंदोलन का रूप लेने लगी है।
कर्मचारियों ने साफ चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने जल्द नियमितीकरण की प्रक्रिया शुरू नहीं की,
तो 10 नवम्बर से पूरे उत्तराखंड में बड़ा आंदोलन शुरू किया जा सकता है।

कर्मचारियों का कहना है —

“जब तक न्याय नहीं मिलेगा, तब तक सड़कों पर आवाज़ उठती रहेगी।”

हालांकि आंदोलन पहले भी कर्मचारी कर चुके है लेकिन सरकार को जरा भी फर्क नहीं पड रहा है। इससे पहले भी 4 अक्टूबर 2025 को सभी निगमों के कर्मचारी आंदोलन का वादा कर चुके थे लेकिन वो आंदोलन स्थगित करना पड़ गया था।

‘आदर्श नियोक्ता’ सरकार, लेकिन भेदभाव सबसे ज्यादा

निजी कंपनियाँ अपने कर्मचारियों को

  • बोनस,
  • मिठाई,
  • और समय-समय पर वेतन वृद्धि देती हैं।

लेकिन उत्तराखंड सरकार बोनस भेदभाव के अधीन कार्यरत संविदा और आउटसोर्स कर्मचारी आज भी
न तो बोनस पा रहे हैं, न डीए, और कई बार तो वेतन भी देर से मिलता है।

विडंबना यह है कि जिसे “आदर्श नियोक्ता” कहा जाता है,
वही सरकार अपने ही कर्मचारियों के साथ सबसे बड़ा भेदभाव कर रही है।
यही कारण है कि संविदा कर्मचारियों की पीड़ा अब जनआंदोलन का रूप ले रही है।

न्यायपालिका ने दिया, लेकिन प्रशासन ने रोका रास्ता

संविदा कर्मचारियों की पीड़ा का एक और बड़ा कारण यह है कि
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों के आदेश इनके पक्ष में आने के बावजूद,
सचिवालय के अफसर उन आदेशों को लागू करने से बच रहे हैं।

कर्मचारियों का कहना है —

“अगर सरकार संविधान को मानती है, तो कोर्ट के आदेशों का पालन क्यों नहीं हो रहा?”

यह न केवल अवमानना (Contempt of Court) है,
बल्कि राज्य के मेहनती कर्मचारियों के परिश्रम का अपमान भी है।

कर्मचारियों की भावनात्मक अपील: “हमने राज्य के लिए सेवा की है”

संविदा कर्मचारियों की पीड़ा सिर्फ बोनस या वेतन का मामला नहीं है,
यह सम्मान और स्थायित्व की लड़ाई है।
इन कर्मचारियों ने वर्षों से कम वेतन में भी देवभूमि की सेवा की है।

इनका दर्द वही समझ सकता है जिसने कभी नौकरी में असुरक्षा महसूस की हो।
कर्मचारियों की मुख्यमंत्री से अपील है —

“मुख्यमंत्री जी, हम वर्षों से राज्य की सेवा कर रहे हैं।
अब हमारा भी समय है कि हमें सम्मान और स्थायित्व दिया जाए।”

संविदा कर्मियों के साथ न्याय जरूरी

यह केवल बोनस या वेतन का मामला नहीं,
बल्कि सम्मान, समानता और संवैधानिक अधिकारों का प्रश्न है।

संविदा कर्मचारियों की पीड़ा को समझते हुए
सरकार को चाहिए कि जल्द से जल्द नियमितीकरण नियमावली तैयार करे,
ताकि जो लोग राज्य की सेवा में लगातार समर्पित हैं,
उन्हें भी स्थायित्व और सम्मान मिल सके।

क्योंकि जो कर्मचारी आज “उम्मीद की लौ” जला रहे हैं,
वो ही कल इस देवभूमि के “विकास की रोशनी” बनेंगे।

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