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पहाड़ों में दुल्हन की कमी: पहाड़ों में शादी क्यों बन रही चुनौती?

पहाड़ों में दुल्हन की कमी

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पहाड़ों में दुल्हन की कमी को साफ देखा जा सकता है। क्या पहाड़ मे ब्योली (दुल्हन) मिलना इतना कठिन हो गया है? क्या युवा पीढ़ी अब समय पर शादी नहीं कर पाएंगे? चलिए पहाड़ों में दुल्हन की कमी! के इन्ही सवाल जवाबों को हम पहाड़ी सुविधा के इस आर्टिकल के माध्यम से समझेगे। 

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पहाड़ी शादी मे कुछ ज्यादा ही युवा वर्ग सामने आ रहा है, इसे सीधे तौर पर सरकार को जिम्मेदार ठहरना कुछ हद तक ठीक भी है। क्यूंकी पहाड़ों मे अब रोजगार भी कुछ रहा नहीं गया है। जो सीधे-सीधे सरकार सामने आ रही है। पहाड़ का दुर्गम भूगोल तो फिर क्या है ? इस समस्या का कारण ! चलिए थोड़ा विस्तार से समझते हैं।

पहाड़ों में दुल्हन की कमी

उत्तराखंड के पहाड़ी गांव में  अब विवाह योग्य लड़कों को सात फेरों के लिए लड़की नहीं मिलना इस दौर में हमारे समाज का कड़वा सच है। गांव दर गांव कुवरों लड़कों कि संख्या बढ़ती जा रही है। जिसमे पहाड़ों में दुल्हन की कमी को साफ देखा जा सकता है।

पहले लड़कों कि शादी जल्दी हो जाती थी। तब यह बात आम थी तब उनकी उम्र 18 – 28  के बीच होती थी। लेकिन अब 35 से 40 साल तक भी काम नहीं बन रहा है । 

आखिर क्या डिमांड है लड़की पक्ष की 

अगर आपकी सरकारी नौकरी नहीं है और मकान शहरी क्षेत्रों में नहीं है तो रिश्ता मिलना पहाड़ी युवाओ कि लिए बहुत मुश्किल हो जाता है । 

यह आम हो चुका है कि पहाड़ी क्षेत्रों में लड़के पक्ष की शिकायत ज्यादा ही बढ़ रही है। जिसमे उन लोगों का कहना है कि  पहले देहरादून,  हल्द्वानी, दिल्ली, जैसे शहरों में मकान और लड़के की सरकारी नौकरी की डिमांड सामने आ रही है। 

पहाड़ों में दुल्हन की कमी

अब युवा वर्ग भी इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि लड़कों को किस तरह से तैयारिया करनी है। चाहे वो शादी के लिए लड़की का दिल जीतना हो। 

गांव के लड़कों के पास भैजी की बारात में डांस करने के मौके दिनों दिन कम होते जा रहे है। अब तो लड़कों के पास सिर्फ एक ही रास्ता बचा है कि वह अपने मनपसंद की लड़की देखकर खुद ही शादी कर ले। तभी लोगों को भेजी की बारात में नाचने का भरपूर मौका मिलेगा। 

हालांकि हंसने वाली बात तो है ही लेकिन बात कड़वी भी है, और सच्ची भी है। 

पहाडी लडको के साथ-साथ अभिभावकों की पीड़ा 

पहाड़ के अभिभावकों की पीड़ा कुछ अलग ही छलक रही है। उनका कहना है की लड़की ढूंढने जाओ तो उनकी डिमांड ही कुछ अलग दिखाई देती है।

कुछ युवा ऐसे पृष्ठभूमि से निकाल कर आते हैं जो बेहद कमजोर और सामान्य वर्ग के होते हैं। वह अपनी दिनचर्या को बेहतर बनाने में जुटे हैं।  फिर भी उनके सामने यह समस्या आ रही है।

पहाड़ों में दुल्हन की कमी

 इससे उनको तो इतनी चिंता नहीं होती जितना कि उनके अनुभवों को चिंता होती है। 28 से 32 साल के ऊपर कई युवा अभी भी गांव में है। भले वहअच्छी पोस्ट पर भी नौकरी कर रहे हो लेकिन वह सरकारी नहीं है फिर भी अभिभावक परेशान है।  

अब तो पहाड़ों का हाल ऐसे हो चुका है कि जिन लोगों की शादी भी हो रही है तो उन लड़कियों की गारंटी भी नहीं रही क्योंकि पहाड़ में अब वह चलन नहीं रह गया है। और अब अगर लड़की शादी के लिए मान भी गई तो वह पहाड़ में रहना ही नहीं चाहती। 

पहली बात नाइट रिश्तेदारी में ही कर लिया करते थे। व्यवहार के साथ जन्म कुंडली के 36 गुणो के साथ मिलना तय किया जाता था। लेकिन अब हालात एकदम उलटे हो गये है। लड़कों के हाथ पीले करने के लिए दर-दर गांव भटकना पड़ रहा है जो की एक बहुत बड़ी मुसीबत बनती जा रही है। 

पहले जो लड़किया आर्थिक रूप से कमजोर होती थी,उनकी चिंता सताती रहती थी। अब यह चिंता लड़कों के हक में आ गई है। जो लड़कियां पढ़ी-लिखी जा रही हैं वह अपनी पसंद खुद ही चुन रही है। और कुछ परिवार भी अपने इन बच्चों का साथ भी दे रहे हैं। कुछ माँ – बाप ने अब अपने बच्चों पर ही यह बात छोड़ दी है। 

युवा महिलाये शहरी जीवन को पसंद कर रही है

लड़की पक्ष वाले शहरों में मकान फ्लैट या सरकारी नौकरी वालों को प्राथमिकता दे रहे हैं, लेकिन गौर से देखें तो यह समस्या सिर्फ गांव में रहने वाले परिवारों तक भी सीमित नहीं है शहरों में बसे पहाड़ी समाज तक गयी इसकी जड़ें फैली हुई है। 

सामान्य तौर पर कोई भी समुदाय अपने समाज संस्कृति परिवेश में ही नाते रिश्तेदारी बनाना पसंद करता है।  इस कारण विवाह योगी लड़कियों का अकाल शहरों में बसे और अच्छी खासी नौकरी करने वाले पहाड़ी लड़कों के सामने भी है। 

हालांकि शहरों में बसे प्रवासी युवाओं के पास फिर भी गांव में रहते हुए शहरी चकाचौंध का सपना देख रही लड़की मिलने की कुछ संभावना है, साथ ही अब बड़े पैमाने पर इंटर कास्ट मैरिज से भी शहरी युवा अपनी गृहस्थी बसा रहे हैं, 

90 वाले दशक के बाद पैदा हुए लड़के ही अब इस असंतुलन की मार झेल रहे हैं

इसकी वजह तलाशने के लिए हमें बेटे की चाह में बेटियों को कोख में कतल करने वाले स्याह सच को होगी स्वीकार करना होगा ये असंतुलन समाज ने ही पैदा किया है खासकर आर्थिक उदारीकरण के बाद यह बिमारी तेजी से फैल रही है।  इस तरह 90 वाले दशक के बाद पैदा हुए लड़के ही अब इस असंतुलन की मार झेल रहे हैं। 

प्रकाशित पत्रिका का एक सर्वे 

राज्य गठन के समय उत्तराखंड का लिंगानुपात प्रति 1000 पुरुषों पर 964 महिलाओं का था इसके बाद लिंगानुपात में और गिरावट दर्ज होती चली गई टाइम्स ऑफ इंडिया में 26 सितंबर 2022 को प्रकाशित खबर में रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम स्टैटिस्टिकल रिपोर्ट 2020 के हवाले से कहा गया कि 21 वीं सदी के दूसरे दशक तक उत्तराखंड में बाल लिंगानुपात प्रति 1000 लड़कों पर 844 लड़कियों का पहुँच चुका था जो देश में सबसे खराब आंकड़ा है। 

 इस दौरान उत्तराखंड के शहरी क्षेत्रों में तो यह आंकड़ा 821 तक के शर्मनाक स्तर पर भी गया जबकि इसी दौरान देश में औसत बाल लिंगानुपात तीन अंकों के साथ सुधरते हुए 907 पर पहुँच गया था। हालांकि बाद में राज्य सरकार ने इन आंकड़ों को पुराना बताते हुए दावा किया था कि इस दौरान राज्य में लिंगानुपात 1000 लड़कों पर 939 लड़कियां पैदा हुई।

महिलाओ के रोगों का कारण

शादियों के इस सीज़न में गांव दर गांव फंसते सन्नाटे के पीछे भी ये एक अहम वजह हो सकती है हालांकि इसकी कुछ अन्य वजह भी है जिसकी तरफ गढ़वाल यूनिवर्सिटी के राजनीतिक शास्त्र के प्रोफेसर एमएम सेमवाल इशारा करती हैं। वो बताते हैं कि शादियों में आ रही इस समस्या के पीछे कोई एक मात्र सीधा कारक नहीं बल्कि कई कारक हैं। पहाड़ों में स्वास्थ्य की स्थिति भी इनमें से एक है विशेष तौर से महिला रोगों के लिए पहाड़ में डॉक्टरों का अभाव भी इसका एक कारण है।

महिलाओ के पक्ष के कही गई प्रोफेसर सेमवाल की बात 

आये दिन के अखबार ऐसी खबरों से फटे पड़े हैं जहाँ खराब व्यवस्था के अभाव में किसी गर्भवती महिला ने दम तोड़ दिया पहाड़ों में जब गर्भवती महिलाओं के लिए इतनी कठिनाई हो तो कोई भी लड़की पहाड़ में क्यों ही जाना चाहेगीऔर पहाड़ी जीवन की ये कठिनाई सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है प्रोफेसर सेमवाल बताते हैं कि बीते कुछ दशकों में पहाड़ में लड़कियों की शिक्षा में भी काफी सुधार हुआ है।

प्रोफेसर एसपी सती महिलाओ के लिए भावात्मक बोल 

अब कोई भी पढ़ी लिखी लड़की पहाड़ की कठिन दिनचर्या जिसमें घास लाने से लेकर गोबर उठाने तक शामिल हैं। ऐसा जीवन नहीं चुनना चाहती हूँ इस पहलू पर राज्य आंदोलन में शामिल रहे प्रोफेसर एसपी सती भी ज़ोर देते हुए बताते हैं कि पहाड़ों का जीवन हमेशा से महिला केंद्रित रहा है। 

विशेष तौर से खेती से लेकर पूरे घर की जिम्मेदारी एकतरफा महिलाओं के कंधों पर रही पहाड़ में पुरुष पहले से ही नौकरियों के लिए बाहर जाते रहे हैं, और घर में बूढ़े अभिभावकों से लेकर बच्चों मवेशियों और खेती तक की जिम्मेदारी बहू की ही रही है। 

पहाड़ की महिलाओं का जीवन हमेशा से पहाड़ जैसा ही कठिन बनाए रखा है। ऐसे में देहरादून या मैदानी इलाकों की ओर पलायन करना महिलाओं के लिए मुक्ति का द्वार खुलने जैसा भी है। 

यह भी एक बड़ा कारण है। लड़कियां अब पहाड़ों की जगह मैदानी इलाकों में रहने को प्राथमिकता दे रही है अब सवाल यह भी है कि अधेड़ कुंवारों का ये गम क्या उनका निजी मामला बनकर रह जाएगा या इसके कुछ व्यापक सामाजिक खतरे भी हो सकते हैं ?

हमारा उद्देश्य किसी तरह की सनसनी पैदा करने या इस मुददे को अतिशयोक्ति तक ले जाना नहीं है लेकिन बढ़ते अविवाहित पुरुषों की संख्या से किस तरह की विसंगतियो पैदा हो सकती है। 

इसका एक परिदृश्य उत्तराखंड से सटे वेस्ट यूपी के देहातों में देखा जा सकता है वेस्ट यूपी में क्योंकि आर्थिक तरक्की उत्तराखंड के पहाड़ों से पहले पहुंची तो, गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग की जांच वाली बिमारी भी वहाँ हम से पहले पहुँच चुकी थी। 

इस कारण लिंगानुपात वहाँ भी गडबड हुआ। धीरे-धीरे स्थिति ऐसी बनी कि वह ऐसे परिवार बढ़ने लगे जिनमें कोई एक पुरुष सदस्य अविवाहित ही रह जाता था। 

हालांकि वहाँ भी इसके कई कारण थे, जिनमें से जमीन को बंटवारे से बचाना भी एक प्रमुख कारण था लेकिन अविवाहित अधेड़ों की बढ़ती संख्या ने वहाँ नई तरह की समस्याएं पैदा कर दी

साल 1999 में इंडिया टुडे पत्रिका ने इस पर विस्तृत रिपोर्ट की थी। जिसमें जिक्र मिलता है कि तब अधेड़ उम्र के इन अविवाहितों को रणवां कहा जाने लगा था। और वहाँ के पुलिस थानों में बकायदा एक रेजिस्टर्ड अलग से बनने लगा था जिसमें इनके नाम दर्ज किए जाते थे। 

इसमें रजिस्टर को पुलिसिया भाषा में भी रजिस्टर ही कहा जाता था। और इसमें ऐसे अविवाहित अधेड़ों के साथ होने वाले अपराधों का अलग से विवरण दर्ज होता था अब कई जानकार इस बात को लेकर चेता रहे हैं कि कहीं पहाड़ों में भी ऐसे रजिस्टर बनाने की नौबत ना आ जाए ।

निष्कर्ष:

पहाड़ की नौजवान की शादी की बात करें तो आज दोनों तरफ से ही इंसान गलतियां कर रहा है। चाहे वह महिला की तरफ से हो या पुरुष की तरफ से जहां पहले उसने एक तरफ महिला को तवज्जो नहीं दी। वहीं महिला उन दुख दर्द को ध्यान में रखते हुए आज शायद इन्हीं की तरफ चलती जा रही है।

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यह लेख आपको कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया हम तक जरूर पहुँचाए और जुड़े रहे। और अगर आपके गाँव में या आपके साथ कुछ ऐसा ही हुआ है तो पहाड़ी सुविधा को जरूर बताए। आपका कमेन्ट हमारे लिए बहुमूल्य है। 

धन्यवाद।

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