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उत्तराखंड जागर: प्राचीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठान

उत्तराखंड जागर

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उत्तराखंड, जिसे देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है, अपनी समृद्ध संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए प्रसिद्ध है। उत्तराखंड जागर इन्हीं परंपराओं में से एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। जागर उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों में प्रचलित एक प्राचीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठान है, जो भूत-प्रेत, देवी-देवताओं और लोक देवताओं की पूजा-अर्चना के रूप में किया जाता है। यह अनुष्ठान न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक भी है।

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जागर क्या है?

उत्तराखंड जागर एक लोकपारंपरिक अनुष्ठान है जिसमें देवी-देवताओं, पूर्वजों और लोक देवताओं का आवाहन किया जाता है। इसे मुख्य रूप से रात के समय आयोजित किया जाता है। कई ऐसे क्षेत्र भी है जहा लोग जागरों को दिन के समय मे भी लगाते है। इसमें भजन या गीत के रूप में कथा का वर्णन किया जाता है। जागर में ढोल-दमाऊं, हुड़का, और रणसिंघा जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है, जिनकी धुन पर लोग भाव-विभोर होकर देवताओं का आवाहन करते हैं।

जागर सिर्फ गीत गायन ही नहीं बल्कि इसे सच्ची घटनाओ पर आधारित कहानिया बताई जाती है, जो गायन के रूप मे गाया जाता है। इसकी पारंपरिक तरीके से तैयारी की जाती है। 

उत्तराखंड जागर

जागर लगाने की सामग्री 

उत्तराखंड मे जागर लगाने के लिए गंगा जल, गाय का दूध, गौमूत्र, खुणजू, दुबुल और गाय का घी ये सब सामग्री चाहिए होती है। देवभूमि मे इन्हे जागर लगाने के लिए सबसे शुद्ध माना जाता है। इन्ही से जागरों की शुरुवात की जाती है। 

और खास चीज जिसमे देवताओ को नचाया जाता है, वह एक चटाई होती है जो स्थानीय लोगों के द्वारा ही बनाई जाती है जिसे गढ़वाली मे मन्दुरू बोलते है। ऐसा माना जाता है कि इसके बगैर देवता का आना स्वाभाविक नहीं होता। 

जागर की प्रक्रिया

जागर की प्रक्रिया में सबसे पहले एक ‘जगरिया’ (जो जागर का नेतृत्व करता है) देवताओं की उपस्थिति का आह्वान करता है। इसके बाद वह विभिन्न कथाओं का गायन करता है, जिसमे देवी-देवताओं के जीवन और उनके कृत्यों पर आधारित होती हैं।

दुबुल,गौमूत्र,गंगा जल: बारी – बारी से गौमूत्र और गंगा जल मे दुबुल को डुबाया जाता है। और फिर उस स्थान मे छिड़काव करते है जहा पर जागरों को शुरू किया जाएगा। इससे उस स्थान को पवित्र किया जाता है। 

  • गाय का दूध: जब देवता प्रकट होते है तब गाय का दूध को उन पर चढ़ाने का कार्य किया जाता है। 
  • गाय का घी और खुणजू: एक बर्तन मे आग रखकर इन दोनों को मिलाया जाता है। जो कि एक तरह से धूप का कार्य भी करता है। इससे वातावरण मे शुद्धिकरण भी होता है साथ ही देवताओ का पुकारने का जरिया भी होता है। 
  • मन्दुरू: यह सब कार्य इसके ऊपर ही किया जाता है। जो एक प्रकार कि चटाई भी होती है। 

जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, भक्तगण उसमे शामिल होकर नृत्य करते हैं और मंत्रों का उच्चारण करते हैं। इस दौरान कुछ विशेष व्यक्तियों पर देवता ‘आवेशित’ हो जाते हैं, जिन्हें ‘देवता का आना’ कहा जाता है। यह दृश्य अत्यंत आस्था और श्रद्धा का प्रतीक होता है।

जागर के प्रकार

  1. देव जागर: इसमें देवी-देवताओं का आवाहन किया जाता है। मुख्यतः यह जागर तब किया जाता है जब किसी विशेष समस्या का समाधान देवताओं की कृपा से प्राप्त करना हो। इसमें लोक देवताओं जैसे गोलू देवता, नंदा देवी, हरू महरू, और भोलेनाथ की पूजा की जाती है।
  2. भूत जागर: यह जागर प्रेतात्माओं, पिशाचों और अन्य नकारात्मक शक्तियों को शांत करने के उद्देश्य से किया जाता है। इसे आमतौर पर तब किया जाता है जब किसी व्यक्ति या परिवार को किसी अनिष्ट का सामना करना पड़ता है और उसे इन शक्तियों से मुक्ति दिलानी होती है।
  3. कर्मकांडी जागर: यह जागर किसी विशेष धार्मिक कार्य या अनुष्ठान के दौरान किया जाता है। इसमें विशेष मंत्रों और विधियों का प्रयोग कर देवताओं और पूर्वजों को प्रसन्न किया जाता है।

जागर की धार्मिक मान्यता

उत्तराखंड की जनता जागर को एक महत्वपूर्ण धार्मिक कृत्य मानती है। उनका मानना है कि इस अनुष्ठान के माध्यम से देवता प्रसन्न होकर उनके दुखों का निवारण करेंगे। जागर का उद्देश्य किसी भी प्रकार की परेशानी, जैसे बीमारियों, प्राकृतिक आपदाओं, या मानसिक कष्टों का समाधान प्राप्त करना होता है। इसमें व्यक्ति की समस्याओं का समाधान देवताओं के माध्यम से किया जाता है, और इसे आध्यात्मिक उपचार के रूप में देखा जाता है।

जिसे आप पूरी दुनिया देवभूमि के नाम से जाना जाता है वो इन्ही जगरों के माध्यम से ही जाना जाता है। आज भी इन जागरों को बड़े धर्म और सच्ची श्रद्धा से देवभूमि उत्तराखंड मे लगाए जाते है जो यहा के लोगों का एक अहम हिस्सा भी है और परंपरा भी। 

जागर का सांस्कृतिक महत्व

उत्तराखंड जागर की समृद्ध संस्कृति और परंपराओं का अभिन्न हिस्सा है। यह न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि लोककथाओं और इतिहास का संरक्षण भी करता है। जागर के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी उत्तराखंड की परंपराएं जीवित रहती हैं। इसमें गाए जाने वाले गीत और कथाएं उत्तराखंड के लोक जीवन और सामाजिक संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। जागर का आयोजन गांवों और कस्बों में सामुदायिक भावना को भी बढ़ाता है, जहां लोग एकजुट होकर अपनी समस्याओं का समाधान खोजने के लिए देवताओं की शरण लेते हैं।

जगरों का समापन

जागर उत्तराखंड की अनूठी और प्राचीन परंपरा है, जो लोक देवताओं और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और आस्था को दर्शाती है। यह अनुष्ठान न केवल धार्मिक है, बल्कि समाज की सांस्कृतिक जड़ों को भी मजबूत करता है। आधुनिकता के इस दौर में भी जागर की प्रासंगिकता बनी हुई है और यह उत्तराखंड के लोगों के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जागर हमें हमारे अतीत से जोड़ता है और हमें यह सिखाता है कि आस्था और विश्वास के माध्यम से हम अपनी समस्याओं का समाधान पा सकते हैं।

निष्कर्ष:

देवभूमि उत्तराखंड ना जाने कितने देवताओ कि भूमि है जिसे अलग – अलग क्षेत्रों मे अलग – अलग प्रकार और  अलग – अलग देवताओ को पूजा जाता है। यह यहा के लोगों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। 

आज के समय मे युवा जिस तरह से तेजी से शिक्षित होता जा रहा है उतनी ही तेजी से यहा कि धरोहर, जागर धीरे – धीरे लुप्त होने की कगार पर है। आप सभी को पता है कि उत्तराखंड खाली होने के साथ साथ अब यहा के लोग भी जागर कम लगते जा रहे है।  

उत्तराखंड जागर उत्तराखंड का एक अहम हिस्सा भी है जिसे आज की युवा पीढ़ी समझने मे भूल कर रहा है। इस धरोहर को बचाने के लिए कई उत्तराखंडी गायक कलाकार बड़े – बड़े मंचों पर इसका प्रदर्शन देश – दुनिया मे कर रहे है। जिनमे श्री प्रीतम भर्तवाण जी (जागर सम्राट) ने अहम भूमिका निभाई है। इसी लिए इन्हे जागर सम्राट के नाम से भी जाना जाता है। 

पहाड़ी सुविधा इस धरोहर को बचाने का एक प्रयास कर रहा है। लेकिन अब आप लोगों को देखना है कि इस धरोहर को किस तरह से बचाया जा सकता है।  

दोस्तों आज का युग भले ही बहुत आगे चल गया हो लेकिन हम सब को मिलकर अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संजोए रखें और आने वाली पीढ़ियों तक इसे पहुंचाना है। अगर आपको यह लेख पसंद आया हो तो Comment मे अपने विचार लिख सकते हो जिसका हम अपने Article मे जोड़ सके। 

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल 

Q.जागर क्या है?

यह एक लोकपारंपरिक अनुष्ठान है जिसमें देवी-देवताओं, पूर्वजों और लोक देवताओं को गीत और लोक कथाओ के माध्यम से बुलाया जाता है। 

Q.दुबुल क्या है?

 यह जमीन पर उगने वाली एक घास है। जिसे देवभूमि उत्तराखंड मे शुद्ध माना गया है। इसका प्रयोग ज्यादातर जागर, शुभ कार्यों के लिए किया जाता है। 

Q.मन्दुरू क्या है ?

यह एक तरह की चटाई होती है जिसमे जागरों के दौरान देवी देवताओ को नचाया जाता है। यह 4-5 प्रकार की घास से बनी होती है। 

Q.क्या देवी देवताओ हमारी रक्षा कारते है?

उत्तराखंड देवी-देवताओ का वास है जिसे हम देवभूमि उत्तराखंड के नाम से भी जानते है। यहा के लोगों पर कुछ भी आपदा – विपदा आती है तो यहा के देवी – देवता उनकी रक्षा के लिए तत्पर रहते है। 

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